Sunday, 25 February 2018

कभी जो चाहा था ज़िन्दगी से,
वो आज मिल रहा है बिन मांगे ही।
अजब सी उलझन है मन में अभी भी,
कि जो हो रहा है उसमें क्या है सही और क्या नहीं।

देर तक सोचा इस बारे में मैंने,
फिर भी कोई जवाब न आया।
जितनी कोशिश की इसे समझने की,
उतना ही खुद को इसमें फंसा पाया।

ज़िन्दगी का मिज़ाज ही बदल सा गया है,
शायद दिल के कोने में कोई घर कर गया है।
अब तक बस कट रहीं थी दिन, महीनों और साल में,
अब फिर से खुल के जीने का बहाना सा मिल गया है।

खुश होऊँ आज में या अतीत में खो जाऊं,
नया सवेरा देखूं या कल के पीछे जाऊं।
नया सा है सब कुछ पुरानी यादों के साथ में,
फिर सोचा बस इस पल को जियूँ, क्योंकि इसके सिवा कुछ भी नही मेरे हाथ में।।

©मनीषा साहू 'पंछी'

Tuesday, 23 June 2015

दिल

हर बार न जाने क्यूँ मुझको,
बस मुझको तोड़ा जाता है,
हर ग़म मुझको ही देते है,
तक़लीफ़ में छोड़ा जाता है।

क्या मेरा काम है बस प्यार करना,
तो घबराहट बतलाऊँ किसको,
तुम तो घर मेरा छोड़ चुके,
अब दर्द अपना सुनाऊँ किसको।

कुछ कहते है मैं कोमल हूँ,
कुछ कहते है पत्थर मुझको,
तुमने तो कहा था मैं हूँ नाज़ुक,
फिर पत्थर सा क्यूँ तोड़ा मुझको।

ये धड़कता था तेरी ख़ातिर,
सब सहता था तेरी ख़ातिर,
जब से तुमने ठुकराया इसको,
ये शायद धड़कना भूल गया।

©मनीषा साहू 'पंछी'

Wednesday, 23 April 2014

मुकद्दर हो न हो संग मेरे,
तुझे अपना बनाना है।
भले कितना खफ़ा हो तू,
तुझे फ़िर भी मनाना है॥

ये दिल न सोचता तुझको,
कभी ऐसा नहीं होता।
तू सपनो में ना आये,
कभी ऐसा नहीं होता॥

शिकायतें हो भले लाखों,
भले तू दूर हो मुझसे।
तेरे ही दिल के कोनें में,
घर अपना बनाना है॥

लम्हें तो बीत जाते है, 
मगर ये दिन नहीं कटते।
खुशियाँ तो जा रहीं पल पल,
मगर ये ग़म नहीं घटते॥

किसी भी राह चल कर के,
अब तो मंज़िल को पाना है।
तेरे प्यार के सागर में,
अब खुद को डुबाना है॥

कि इतना हो करम मुझपे,
ये मुश्किलें दूर हो जाये।
कि तुझे पाने की चाहत में,
खु़दा को आज़माना है॥

--मनीषा साहू 'पंछी'--

Monday, 31 March 2014

दुविधा रहे जो भीतर मन के कछु भीतर जाये।
कोरा मन को कीजियेतब भीतर प्रेम समाये॥

--मनीषा साहू 'पंछी'--


Friday, 21 February 2014

"Whenever you love someone, you don't love him or her, you just love your own choice nothing else."

--मनीषा साहू 'पंछी'--

Thursday, 20 February 2014

"Love is blind until you fell in love."

--मनीषा साहू 'पंछी'--

Tuesday, 12 November 2013

ये रात कहीं ना जायेगी....!!

जब थी ज़ुबा पर खामोशी,
और था दिल
में सुकून,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब ना था कुछ पाने का लालच,
ना था कुछ खोने का डर,
वो रात फ़िर ना आयेगी।


जब थी आँखो
में चैन की नींद,
खुद से करने को कोई प्रश्न न था,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब दूसरो की खुशी के लिये कर बैठे अपना नुकसान,
फ़िर भी दिल पर कोई बोझ न था,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब पराये भी लगने लगे अपने,
हम अपने कर्मो से पहचाने गये,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब खोकर सब कुछ एक उम्मीद न खोयी,
उसी के सहारे फ़िर नई शुरूवात हुयी,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब कलम से ये सब अल्फ़ाज़ लिखे,
उन अल्फ़ाज़ो का मतलब खोजने बैठै,
तब दिल से मेरे एक आवाज़ मिली,
जो सारी रात ये कहती रही,
कि जब तक तू ना चाहेगा, ये रात
कहीं ना जायेगी,
ये रात बस थम सी जायेगी, ये रात कहीं ना जायेगी...!!

            --मनीषा साहू 'पंछी'--

Thursday, 5 September 2013

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें...!!

सृष्टि का सन्चार शिव है,
गुरु है ज्ञान का आधार।
तप से मैं शिव को पा तो लूँ,
पर बिन गुरु कैसे हो ये साकार॥

पहला गुरु माँ को बतलाकर,
गुरु ने माँ को सम्मान दिया।
दूजा गुरु जिसने जग का भेद बताकर
सत्य असत्य का ज्ञान दिया॥

गुरु ही है जिसने ज्ञान पर अपने,
कभी नही अभिमान किया।
गुरु ही है जिसने तप से अपने,
दूर अज्ञान का अन्धकार किया॥


गुरु की महिमा है अपरमपार,
गुरु से ही जीवन्त है ये संसार।
जो गुरु ईश्वर का मार्ग दिखाये,
ऐसे गुरु को है मेरा नमस्कार॥


    --मनीषा साहू 'पंछी'--

Tuesday, 26 February 2013

फिर एक आह दिल से निकल गयी,
जहाँ से चले थे ज़िन्दगी वहीं ठहर गयी।
जिन निगाहों को संभाला था कि न देखे तुझे ,
जाने क्यूँ ये ग़ुनाह निगाहें फिर से कर गयीं
 
जाने कितने लम्हें बीत गए तुझे देखे हुये,
जो देखा तुझे ये धड़कन फिर से बढ़ गयी।
सबक़ न लिया कोई अपने टूटे हुए दिल से मैंने,
अब रोज़ टूट जाने की इसे आदत सी पढ़ गयी

अभी कुछ देर तक एक उम्म़ीद बाकी थी मुझमें,
वो उम्म़ीद भी अब दूर जाने कहाँ निकल गयी।
ख़ैर छोड़ो ये सब ज़िन्दगी के फ़लसफ़े हैं,
इन ठोकरों से ज़िन्दगी को एक असलियत मिल गयी

                     --मनीषा साहू 'पंछी'--

Thursday, 7 February 2013

Just I want to say....

I never force you to love me.
I never flirt with someone to make you angry.
I never warn you to do not speak with others.
I never say don’t do the thing you want.
You are like a bird for me.
Free to fly away anywhere you want to go.
Only thing you must to know.
Wherever you go or whatever you do.
When you decide to come back &
feel you need me.
Just remember..
I’m always here for you to give you Oceans of Love.


                             ---Unknown---

Tuesday, 1 January 2013

लो अंत हुआ लो बीत गया,
एक निर्मोही निर्दयी समय का।
ना मेरा था वो ना तेरा था,
वो था कुछ हाथों की कठपुतली।
अब तक था देखा समय नचाये,
अब खुद नाच रहा कुछ उंगली॥

रावण सा था बुद्धिमान वो,
फिर भी दस शीश कटा बैठा।
अब क्या गाऊं उन दिनों की गाथा,
जो खुद अपना वर्चस्व मिटा बैठा॥

जो बुद्धिमान की बुद्धि छीन कर,
बुद्धिहीन बना बैठा।
जो काले कुछ चेहरों के बाहर,
सफ़ेद नकाब लगा बैठा॥

समय व्याधि है या लोग व्याधि है,
इसका भेद ना जानूँ मैं।
कौन सही है कौन गलत है,
कैसे तुझको पहचानूँ मैं॥

साल के वो दिन 366,
कैसे बीते किससे पूछूँ।
हर दिल में है एक दर्द छुपा,
कैसे झेला किससे पूछूँ॥

साल की यह अंत रात है,
सब जग बिसराये बैठे है।
दिन बदलेगा युग बदलेगा,
ये आस लगाये बैठे है॥

काश नए एक दिन के साथ,
वक़्त भी कुछ बदल जाता।
बेबसी लाचारी जो अब है,
वो मंज़र कुछ तो थम जाता॥

लो आ पहुँचे एक नए वर्ष में,
शायद नया सवेरा लायेगा।
जो नैय्या डूबी है हम सब की,
उसको पार लगायेगा॥
 

--मनीषा साहू 'पंछी'--

Friday, 30 November 2012

हर शख्स था नाराज मुझसे,
हर फिज़ा में थी उदासी।
हर ज़र्रे ने तोड़ा मुझे है,
अब जान बाकी है ज़रा सी॥


ज़िन्दगी ग़ुमनाम सी अब,
बन रही है एक पहेली।
कुछ ना जानू कब कहाँ,
जा रही हूँ मैं अकेली॥

 
वक़्त था जो साथ चलता,
हर गिरते-उठते कदम तक।
रूह तक
है काँप जाती,
एक कदम के वास्ते अब॥


--मनीषा साहू 'पंछी'--

Friday, 2 November 2012

कि मुझमे जान बाकी है....!!

अभी मंजिल की नहीं परवाह,
अभी तो शाम़ बाकी है।
वक़्त ठहर जा कुछ लम्हा,
तमाम़ काम बाकी है॥

अभी है ज़िन्दगी जीना,
हकीक़त जाननी है इसकी।
अभी जो पाने है मुझको,
वो सारे मुक़ाम बाकी है॥

अभी भी सीख रही हूँ मैं,
कि कैसे जीतना है जग को।
थोड़ा हौसला है खुद में,
थोड़ा गुमाऩ बाकी है॥

अभी है ख़्वाइशें धुंधली,
अभी सपने अधूरे हैं।
अभी कुछ अनकहे है जो,
मेरे अरमाऩ बाकी हैं॥

न कर कोशिश ज़माने में,
मुझे बदनाम करने की।
अभी भी इस जहाँ में कुछ,
मेरी पहचान बाकी है॥

मौत ठहर जा कुछ पल को,
न हो यूँ रूबरू मुझसे।
अभी ना जीत है तेरी,
कि मुझमे जान बाकी है॥


--मनीषा साहू 'पंछी'--

Wednesday, 5 September 2012

शिक्षक दिवस की शुभ शुभकामना....!!

सही गलत का अंतर समझाया,
दुनियां से जीतने का गुर सिखलाया।
अपने ज्ञान के दीपक से जिसने,
मेरे अज्ञान के अँधेरे को है मिटाया॥

ऐसे गुरु का गुणगान करूँ मैं,
उसकी महिमा का क्या बखान करूँ मैं।
जिसका हाथ रहे सर पर जब,
हर मुश्किल को आसान करूँ मैं॥

जलता रहे सतत ये ज्ञान का दीपक,
हम सबको अलौकिक करे निरंतर।
हम सबकी है ये मंगलकामना,
शिक्षक दिवस की शुभ शुभकामना॥

      --मनीषा साहू 'पंछी'--

Tuesday, 8 May 2012

I really miss that person....

I really miss that person who was often in front of me
but I couldn’t see him..

I really miss that person whom I could heard
but I couldn’t reply to him..

I really miss that person who when came to me
I had to change my way..

I really miss that person who stared at me
when I tried to ignore him..

I really miss that person whom I love
And It’s not unknown to him..

I really miss that person who always noticed me
but never said anything to me..

I really miss that person who is a stone-hearted
And I failed to melt him..

I really miss that person who is very far from my life
but still in my heart…..!!

                                    ---Manisha Sahu---

Sunday, 5 February 2012

क्यूँ नही आता....

बातें वो दिल में रखते है,
मगर कुछ कह नहीं पाते।
सलीका-ए-इश्क़ भी उनको,
जताना क्यूँ नहीं आता॥

नज़र मिलती है जब उनकी,
मेरी नज़रों से एक पल को।
हुयी जो दिल में एक हलचल,
सुनाना क्यूँ नहीं आता॥

कभी वो देखते मुझको,
कभी मैं देखती उनको।
मगर जो दिल में बातें है,
बताना क्यूँ नहीं आता॥

कशिश है उनके भी दिल में,
कशिश है मेरे भी दिल में।
मगर जो दिल की दूरी है,
मिटाना क्यूँ  नही आता॥

 --मनीषा साहू 'पंछी'--

Monday, 30 January 2012

रेत़ जैसी है ज़िन्दगी हर पल फ़िसलती है कुछ लम्हा,
क़ाश इन लम्हों को समेटने का हुनर आता होता।

हर पल कुछ हसीन ख़्वाब देखती है ये ज़िन्दगी,
क़ाश उन ख़्वाबो को सच करने का हुनर आता होता।

सुकून की ज़िन्दगी की तलाश में खुद को थका बैठे इस कदर,
क़ाश लम्बे रस्ते को एक पल में तय करने का हुनर आता होता।

ख़ुद के सवालों में आज हम उलझे है कुछ इस कदर,
क़ाश इन सब सवालों से बच के निकलने का हुनर आता होता


                                          --मनीषा--

Sunday, 29 January 2012

मत पूछो यारो मुझसे....

बातें भूल गयी हैं लेकिन,
एहसास नहीं भूला है आज भी
तुझसे दूरी के जब,
एहसास में भी खुश रहते थे॥

तस्वीर तेरी इन आँखों में ,
धुंधली न कहीं ये पड़ जाये
तेरी एक झलक पाने की ख़ातिर,
फ़िरते फ़िरते रहते थे॥

सोते तो नींद नहीं आती,
जगते तो आँखे दुखती थी
दिन कैसे सारा बीत गया,
जाने क्या करते रहते थे॥

पतझड़ बीता सावन आया,
सावन भी जैसे पतझड़ था
हर ख़्वाब मेरे सच होने से पहले,
जब टूट कर गिरते रहते थे॥

करवट ली ऐसी जीवन ने मेरे,
खुशियाँ जैसे हो रूठ गयी
एक ख़ुशी कहीं तो मिल जाये,
बस दुआ ये करते रहते थे॥

क्यूँ उतरी इतनी गहराई में,
जब तैरना न सीखा मैंने
बस यही एक सवाल हम अक्सर,
ख़ुद से पूछा करते रहते है॥

अब तक की सारी बातें जो,
अल्फाज़ो में मैंने है बदली
मत पूछो यारो मुझसे,
ये दर्द कहा छुपे रहते थे॥

             --मनीषा--

Wednesday, 18 January 2012

Hum Tum Jab Yaadon Ke Safar Me.....

Hum tum aksar yaadon ke safar me,
Saath chala karte the,
Kuch baatein hum kahte the
Aur kuch tum kaha karte the.

Kabhi sardi ki dhoop me,
Sadko par tahla karte the,
To kabhi bina chhatri,
Barish ka maza liya karte the.

Kabhi class me sath baith kar,
Padhai kiya karte the,
To kabhi ghumne ki jid me,
Class bank kiya karte the.

Kabhi faltu lecture se hum.
Bore hua karte the,
To kabhi exam me bhi chhuttiyo ke,
Din gina karte the.

Kabhi ruthte ek duje se,
Kabhi use manate the,
Kabhi ghumne ke chakkar me,
Ghar pe daant bahut khate the.

Kabhi exam ke ek din pahle,
Book khola karte the,
Kisne kya kya padh liya,
Ye bhi pucha karte the.

Kabhi ghatia marks dekh kar,
Khud pe hi hasa karte the,
To kabhi copy re-check ke liye,
Form bhara karte the.

Ab to ye saari chize,
Ho gayi hai baat purani,
Jab khud ki galti pe bhi,
Duje pe bigda karte the.

Ab to bas un saari baaton ko,
Yaad kiya karte hai,
Hum tum jab yaadon ke safar me,
Saath chala karte the.

                 - -By Manisha- -

Thursday, 5 January 2012

डायरी....

आज कई वर्षों बाद मैं अपने घर वापस लौटी। जब लौटी तो देखा, वही धूल से लिपटे हुये दरवाजे और खिड़कियाँ, फर्श पर बिछी हुयी धूल की चादर  और अलमारियोँ पर सजीं हुयी किताबें जो समय के साथ-साथ कुछ पीली सी पङ गई थी। तो दूसरी तरफ रखे थे कुछ रंग-बिरंगे पेन जो वक्त बीतने के साथ-साथ चलना भी भूल गये थे। और एक कोने में पङी थी वो पुरानी सी डायरी जो मेरे पूरे अतीत को आज भी खुद में समेटे हुये है।  जब मैनें डायरी खोली तो डायरी के पीले पङ चुके पन्नों ने मुझे एक बार फिर से अतीत में पहुँचा दिया।  अभी मैं अतीत की खुशनुम़ा यादों में खोई ही हुयी थी कि अचानक मेरी नज़र डायरी के उन पन्नों पर पङी जो कई साल पहले मैनें ही फाङ कर फेंक दिये थे।  क्योंकि ज़िन्दगी के कुछ ऐसे राज़ भी थे जिनकी असल ज़िन्दगी में कोई जगह न थी। ये वो राज़ थे जिसे सिर्फ मैं या मेरी  डायरी ही जानती थी

                                --मनीषा साहू 'पंछी'--

Monday, 2 January 2012

एक वक्त ऐसा आयेगा,
जब हर सच नज़र आ जायेगा।
क्या है बन्द दरवाजों के पीछे,
हर राज़ तब खुल जाये गा॥

जो होते है आज हमसे ख़फा,
कल खुद की ही बातों पर बस अफसोस करेंगें।
करेंगें हमारी तरह ही वो कल बातें,
अपना इतना असर तो उन पर बाकी रह जायेगा॥

उन्हें दुनियाँ की फितरतों से बचाने की कोशिश में,
खुद अपने ही जाल में उलझते गये हम,
जो देखते है श़क की निगाहों से आज मुझको,
कल खुद की निगाहों से उनका यकीं टूट जायेगा॥

                                    --मनीषा--

Sunday, 1 January 2012

नव वर्ष का आगमन....

नव वर्ष का हुआ आगमन,
बीत गया देखो फिर एक साल।
प्रवेश करो नये साल में फिर से,
मिटाकर सारे द्वेष, विकार ॥

नयी किरन के साथ है आया
नयी खुशियोँ का पता बताने।
नया सवेरा, नही अँधेरा
नया सौभाग्य बैठा सिरहाने ॥

करो कामना मंगल की तुम,
मंगल होंगें सारे काज।
संशय और अज्ञान मिटाकर,
कर लो नभ में तुम परवाज ॥

नये रंगों से रंगे ये जीवन,
नयी खुशियोँ की भेंट के साथ।
नये पुष्प सा खिले ये उपवन,
नये सवेरे और किरन के साथ ॥

                      --मनीषा--

Thursday, 22 December 2011

ठहरे हुए कद़म जाने कब चलेंगें मेरे,
बस एक वक़्त ही है एक लम़्हा कभी ठहरता नहीं है।

कब से खड़े हैं हम उसी मोड़ पर आज भी,
सोच कर अब तेरे सिवा मेरी कोई मंजिल नहीं हैं।

तेरा वो रूठकर जाना मेरा दिल तोड़ गया उस पल,
जिस पल कहा तूने, कि तू मेरे काबिल नहीं है।

सुना है मोहब्बत-ए-इश़्क में अक़्सर ये दिल टूट जाया करते हैं,
यकीं आया तो ये जाना इस दरिया का कोई साहिल नहीं हैं।
 
मुरौव्व़त कर दे या मौला मेरे इन दिल के टुकड़ो पर,
कि अब जाना सिवा तेरे मेरा कोई हासिल नहीं हैं॥
 
                                  --मनीषा--

Sunday, 20 November 2011

सुबह जो जागी तो कोई न था सामने,
सोंचा सपनों में ही होती तो तू पास तो होता।
खुद से ही बातें करनी पङती है अब मुझको,
ख़्वाबों में तुझे मेरी बातों का एहसास तो होता॥

तेरी चाहत का ख़ुमार छाया है मुझ पर,
हर तरफ बेकरारी सी लिपटी हुई है।
कितने बेदर्द लम्हें गुज़ारे तेरे बिन,
तुझे बयाँ करने को पास मेरे अल्फ़ाज तो होता॥

चंद लम्हों की थोङी सी खुशियों की खातिर,
तमाम खुशियों को कुऱबान हम कर गये।
खुद को भी भुला देती चाहत में तेरी,
तेरे दिल में मेरी मोहब्बत का आगाज़ तो होता॥

                                            --मनीषा साहू 'पंछी'--

Wednesday, 26 October 2011

शुभ दीपावली....!!


शुभ हो दीपावली आपकी,
हर दिन दीपावली सा शुभ हो॥

पूरी हो हर मनोकामना,
गणपति का रहे आशीष सदा।
हर दु:ख से मुक्ति मिल जाये,
खुशियोँ की चले बयार सदा॥

रौशन दीपकों की तरह,
जीवन भी रौशन हो जाये।
दु:ख के अँधियारे को अलौकिक,
बस एक किरण तो मिल जाये॥

लक्ष्मी का रहे निवास सदा,
धन-धान्य से झोली भर जाये।
मन में सरस्वती का वास रहे,
बस ज्ञान ही हर ओर बिखर जाये॥

मीठे पकवानों जैसा,
जीवन भी मीठा हो जाये।
हर्ष और उल्लास रहे,
ये पर्व सुनहरा हो जाये॥

                 --मनीषा--

Tuesday, 11 October 2011

 
हर दिन हो एक खुशनुमा सवेरा,
रोशनी हो बिखरी न हो कहीं अन्धेरा।
न चले अब कभी ग़म की कोई आँधी,
हर तरफ हो बस खुशियोँ का बसेरा॥

सच की जीत हो हमेशा,
और झूठ को प्रायश्चित मिले।
प्रेम का अस्तित्व रहे सदा,
न बैर का कोई फूल खिले॥

रंग, भेद, जाति और धर्म की,
मिट जायें सारी दीवार।
रह जाये इस जग में केवल,
प्रेम, समर्पण और सदाचार॥

सात रंग से रंगा ये जीवन,
सात सुरों सा अविरल बहे।
सात वचन से जुङा हर रिश्ता,
सात जन्म तक साथ रहे॥

क्या खोया क्या पाया किसने,
इस सोंच से हम रहे परे।
छोटी सी आहट भी खुशियोँ की,
मुस्कान बनकर होंठो पर रहे॥

न हो पीढ़ा कि क्या खोया हमने,
न ही उसका कोई विषाद रहे।
इस बार तो हासिल होगा वो,
बस दिल में एक उन्माद रहे॥

कर ले चाहे कोई लाख जतन,
न तोङ सके तेरे मन को।
इस बार भी कर कुछ ऐसा तू,
तू दुनियाँ का सरताज रहे॥

                      --मनीषा--

Monday, 5 September 2011

हे गुरू, तुझे शत् शत् नमन।


हे गुरू, तुझे शत् शत् नमन।

जिसने किया मेरे मन को अपने ज्ञान से पावन,
जिसकी छाँव तले सीखा मैनें 'क्या है जीवन'।
जिसका करते है सभी भगवान भी वन्दन,
ऐसे गुरू महान को मेरा शत् शत् नमन।

जिसने मुझे सिखाया क्या है मर्म इस जीवन का,
जिसने मुझे बताया कौन सा मार्ग है सफलता का।
जिसने किया हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन,
ऐसे गुरू महान को मेरा शत् शत् नमन।

जिसकी सच्चाई से मैनें सच बोलना सीखा,
जिसके कठिन परिश्रम ने मुझे व्यवहार-कुशल बनाया।
जिसकी वजह से आया हर क्षण मुझमें परिवर्तन,
ऐसे गुरू महान को मेरा शत् शत् नमन॥

                                   --मनीषा--