कभी जो चाहा था ज़िन्दगी से,
वो आज मिल रहा है बिन मांगे ही।
अजब सी उलझन है मन में अभी भी,
कि जो हो रहा है उसमें क्या है सही और क्या नहीं।
देर तक सोचा इस बारे में मैंने,
फिर भी कोई जवाब न आया।
जितनी कोशिश की इसे समझने की,
उतना ही खुद को इसमें फंसा पाया।
ज़िन्दगी का मिज़ाज ही बदल सा गया है,
शायद दिल के कोने में कोई घर कर गया है।
अब तक बस कट रहीं थी दिन, महीनों और साल में,
अब फिर से खुल के जीने का बहाना सा मिल गया है।
खुश होऊँ आज में या अतीत में खो जाऊं,
नया सवेरा देखूं या कल के पीछे जाऊं।
नया सा है सब कुछ पुरानी यादों के साथ में,
फिर सोचा बस इस पल को जियूँ, क्योंकि इसके सिवा कुछ भी नही मेरे हाथ में।।
©मनीषा साहू 'पंछी'


