Monday, 29 August 2011

कुछ इस तरह....

ग़म के सागर में खुद को डुबा लूँ कुछ इस तरह मैं,
खुशियों की बहारें भी आ जाये तो कुछ पता न चले।

हर ज़र्रे से मिटा दूँ तेरा नाम कुछ इस तरह मैं,
ग़र मुझे तेरी याद भी आये तो कुछ पता न चले।

बना लूँ दिल को अपने कठोर कुछ इस तरह मैं,
कोई फिर से चोंट कर जाये तो कुछ पता न चले।

ज़ुदा कर दूँ सपने को हक़ीकत से कुछ इस तरह मैं,
कोई सपना फिर से टूट जाये तो कुछ पता न चले।

अपनी नजरों से मिटा दूँ तेरा अक़्स कुछ इस तरह मैं,
तू सामने भी आ जाये तो कुछ पता न चले।

कर लूँ ज़ुदा ज़िन्दगी के बहानों से खुद को कुछ इस तरह मैं,
मेरा दिल ख़ामोश भी हो जाये तो कुछ पता न चले।

                                      --मनीषा--

Thursday, 25 August 2011

Where is life..??

Is there a life,
When we see ourself as the most happiest person in the world.
Or when we are the reason of others' happiness.

Is there a love,
When we are in the arms of our love.
Or when we know that someone is waiting for us till the end of his life.

Is there a care,
When we sleep without a fear of lossing something.
Or when someone can sleep not for a single moment to be with us..

                                                           - -By Manisha- -

Friday, 5 August 2011

अक़्स है ऐसा उसका,
होता नही ओझल वो एक पल के लिये।
हर घङी रहता है सामने वो नजरों के
जैसे मेरा हो गया हो वो हर पल के लिये॥

नींदों में भी वो पास है मेरे,
ख़्वाबों में भी उसका साथ है।
बन्द आँखों से भी नजर आता,
हर वक्त उसका ही एहसास है॥

हर प्यार लुटा दूँ उस पर,
हर गम को उसके चुरा लूँ।
हर आईने में हो सूरत उसकी,
हर लम्हें में उसको बसा लूँ॥

तमन्ना है उसे पाने की,
हर दर्द अपना भुला जाने की।
क्या सुनाऊँ उसे हाल-ए-दिल अपना,
जो कोशिश में है मुझे भूल जाने की॥

                         --मनीषा--