Thursday, 22 December 2011

ठहरे हुए कद़म जाने कब चलेंगें मेरे,
बस एक वक़्त ही है एक लम़्हा कभी ठहरता नहीं है।

कब से खड़े हैं हम उसी मोड़ पर आज भी,
सोच कर अब तेरे सिवा मेरी कोई मंजिल नहीं हैं।

तेरा वो रूठकर जाना मेरा दिल तोड़ गया उस पल,
जिस पल कहा तूने, कि तू मेरे काबिल नहीं है।

सुना है मोहब्बत-ए-इश़्क में अक़्सर ये दिल टूट जाया करते हैं,
यकीं आया तो ये जाना इस दरिया का कोई साहिल नहीं हैं।
 
मुरौव्व़त कर दे या मौला मेरे इन दिल के टुकड़ो पर,
कि अब जाना सिवा तेरे मेरा कोई हासिल नहीं हैं॥
 
                                  --मनीषा--

Sunday, 20 November 2011

सुबह जो जागी तो कोई न था सामने,
सोंचा सपनों में ही होती तो तू पास तो होता।
खुद से ही बातें करनी पङती है अब मुझको,
ख़्वाबों में तुझे मेरी बातों का एहसास तो होता॥

तेरी चाहत का ख़ुमार छाया है मुझ पर,
हर तरफ बेकरारी सी लिपटी हुई है।
कितने बेदर्द लम्हें गुज़ारे तेरे बिन,
तुझे बयाँ करने को पास मेरे अल्फ़ाज तो होता॥

चंद लम्हों की थोङी सी खुशियों की खातिर,
तमाम खुशियों को कुऱबान हम कर गये।
खुद को भी भुला देती चाहत में तेरी,
तेरे दिल में मेरी मोहब्बत का आगाज़ तो होता॥

                                            --मनीषा साहू 'पंछी'--

Wednesday, 26 October 2011

शुभ दीपावली....!!


शुभ हो दीपावली आपकी,
हर दिन दीपावली सा शुभ हो॥

पूरी हो हर मनोकामना,
गणपति का रहे आशीष सदा।
हर दु:ख से मुक्ति मिल जाये,
खुशियोँ की चले बयार सदा॥

रौशन दीपकों की तरह,
जीवन भी रौशन हो जाये।
दु:ख के अँधियारे को अलौकिक,
बस एक किरण तो मिल जाये॥

लक्ष्मी का रहे निवास सदा,
धन-धान्य से झोली भर जाये।
मन में सरस्वती का वास रहे,
बस ज्ञान ही हर ओर बिखर जाये॥

मीठे पकवानों जैसा,
जीवन भी मीठा हो जाये।
हर्ष और उल्लास रहे,
ये पर्व सुनहरा हो जाये॥

                 --मनीषा--

Tuesday, 11 October 2011

 
हर दिन हो एक खुशनुमा सवेरा,
रोशनी हो बिखरी न हो कहीं अन्धेरा।
न चले अब कभी ग़म की कोई आँधी,
हर तरफ हो बस खुशियोँ का बसेरा॥

सच की जीत हो हमेशा,
और झूठ को प्रायश्चित मिले।
प्रेम का अस्तित्व रहे सदा,
न बैर का कोई फूल खिले॥

रंग, भेद, जाति और धर्म की,
मिट जायें सारी दीवार।
रह जाये इस जग में केवल,
प्रेम, समर्पण और सदाचार॥

सात रंग से रंगा ये जीवन,
सात सुरों सा अविरल बहे।
सात वचन से जुङा हर रिश्ता,
सात जन्म तक साथ रहे॥

क्या खोया क्या पाया किसने,
इस सोंच से हम रहे परे।
छोटी सी आहट भी खुशियोँ की,
मुस्कान बनकर होंठो पर रहे॥

न हो पीढ़ा कि क्या खोया हमने,
न ही उसका कोई विषाद रहे।
इस बार तो हासिल होगा वो,
बस दिल में एक उन्माद रहे॥

कर ले चाहे कोई लाख जतन,
न तोङ सके तेरे मन को।
इस बार भी कर कुछ ऐसा तू,
तू दुनियाँ का सरताज रहे॥

                      --मनीषा--

Monday, 5 September 2011

हे गुरू, तुझे शत् शत् नमन।


हे गुरू, तुझे शत् शत् नमन।

जिसने किया मेरे मन को अपने ज्ञान से पावन,
जिसकी छाँव तले सीखा मैनें 'क्या है जीवन'।
जिसका करते है सभी भगवान भी वन्दन,
ऐसे गुरू महान को मेरा शत् शत् नमन।

जिसने मुझे सिखाया क्या है मर्म इस जीवन का,
जिसने मुझे बताया कौन सा मार्ग है सफलता का।
जिसने किया हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन,
ऐसे गुरू महान को मेरा शत् शत् नमन।

जिसकी सच्चाई से मैनें सच बोलना सीखा,
जिसके कठिन परिश्रम ने मुझे व्यवहार-कुशल बनाया।
जिसकी वजह से आया हर क्षण मुझमें परिवर्तन,
ऐसे गुरू महान को मेरा शत् शत् नमन॥

                                   --मनीषा--

Monday, 29 August 2011

कुछ इस तरह....

ग़म के सागर में खुद को डुबा लूँ कुछ इस तरह मैं,
खुशियों की बहारें भी आ जाये तो कुछ पता न चले।

हर ज़र्रे से मिटा दूँ तेरा नाम कुछ इस तरह मैं,
ग़र मुझे तेरी याद भी आये तो कुछ पता न चले।

बना लूँ दिल को अपने कठोर कुछ इस तरह मैं,
कोई फिर से चोंट कर जाये तो कुछ पता न चले।

ज़ुदा कर दूँ सपने को हक़ीकत से कुछ इस तरह मैं,
कोई सपना फिर से टूट जाये तो कुछ पता न चले।

अपनी नजरों से मिटा दूँ तेरा अक़्स कुछ इस तरह मैं,
तू सामने भी आ जाये तो कुछ पता न चले।

कर लूँ ज़ुदा ज़िन्दगी के बहानों से खुद को कुछ इस तरह मैं,
मेरा दिल ख़ामोश भी हो जाये तो कुछ पता न चले।

                                      --मनीषा--

Thursday, 25 August 2011

Where is life..??

Is there a life,
When we see ourself as the most happiest person in the world.
Or when we are the reason of others' happiness.

Is there a love,
When we are in the arms of our love.
Or when we know that someone is waiting for us till the end of his life.

Is there a care,
When we sleep without a fear of lossing something.
Or when someone can sleep not for a single moment to be with us..

                                                           - -By Manisha- -

Friday, 5 August 2011

अक़्स है ऐसा उसका,
होता नही ओझल वो एक पल के लिये।
हर घङी रहता है सामने वो नजरों के
जैसे मेरा हो गया हो वो हर पल के लिये॥

नींदों में भी वो पास है मेरे,
ख़्वाबों में भी उसका साथ है।
बन्द आँखों से भी नजर आता,
हर वक्त उसका ही एहसास है॥

हर प्यार लुटा दूँ उस पर,
हर गम को उसके चुरा लूँ।
हर आईने में हो सूरत उसकी,
हर लम्हें में उसको बसा लूँ॥

तमन्ना है उसे पाने की,
हर दर्द अपना भुला जाने की।
क्या सुनाऊँ उसे हाल-ए-दिल अपना,
जो कोशिश में है मुझे भूल जाने की॥

                         --मनीषा--

Tuesday, 5 July 2011

सफर ज़िन्दगी का..!!

है कितना अजीब़ ये सफर ज़िन्दगी का,
न जाने कितनें अन्जानें मोङ हैं इसमें।
पहुँचता नहीं हर मोङ अपनी मंजिल तक,
सिमट जाती है कभी मंजिल ही खुद में।।

कभी ख़ुद को तन्हा अकेला है पाया,
कभी ख़ुद सफर हमसफर बन गया।
कभी रातें गुज़री थी यूँ ग़मज़दा,
कभी ख़ुद ये दर्द-ए-दवा बन गया।

कभी कोई साथी मिला था सफर में,
कभी वो भी हमसे खफ़ा हो गया।
किया था इन्तजार उसकी वफा का,
न जाने क्यूँ वो बेवफा हो गया।

हवायें अजब थीं, सदायें अजब थीं,
उस तन्हा सफर की फिज़ायें अजब थीं।
ऐसा छाया वो गुमनाम अन्धेरा,
कि सुबह का सूरज फना हो गया।

पहुँच गये करीब़ मंजिल के हम अपनी,
पर ज़िन्दगी का मकसद कहाँ खो गया।
चाहा लौटना उसी राह पर तो देखा,
ये सारा जहाँ गुमशुदा हो गया।

                     --मनीषा--

Thursday, 16 June 2011

ऐसा क्यूँ होता है..??

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा, जैसा चाहते है हम,
होता है उसके बिल्कुल विपरीत।
जब भूलना चाहते है पुरानी बातों को,
तो क्यूँ सामने आ जाता है अतीत।

संघर्ष करते है पूरी ज़िन्दगी हम,
फिर भी हासिल नहीं होती कोई जीत।
जिसे पा नहीं सकते इस जन्म में,
न जाने क्यूँ होती है उससे ही प्रीत।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....

क्यूँ गुज़ार देते हैं हम अपनी ज़िन्दगी,
एक झूठ पर भरोसा करके।
क्यूँ समझना नहीं चाहते हम,
ज़िन्दगी के इस कङवे सच को।

क्यूँ एक उम्मीद होती है अक़्सर,
कि शायद मंज़िल करीब है।
क्यूँ नहीं मानते हम इस सच को,
कि ये तो अपना अपना नसीब़ है।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....

क्यूँ नहीं कर पाते हम नफरत,
जिससे हम प्यार करते हैं।
क्यूँ भरी महफिल में भी खुद को,
तन्हा सा महसूस करते हैं।

क्यूँ छलक जाते हैं आँसू,
जब वो शक़्स दूर होता है।
क्यूँ होते हुये भी सब कुछ,
ये दिल मजबूर होता है।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....

क्यूँ खुशी के माहौल में भी,
एक याद चुपके से चली आती है।
क्यूँ लोगों की भीङ में भी हमें,
तन्हा सा कर जाती है।

क्यूँ बिना किसी मकसद के,
ये ज़िन्दगी चलती जाती है।
क्यूँ मन्ज़िल के करीब़ आकर,
अक्सर ये साँसेँ खत्म हो जाती हैं।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....कि सारी ख्वायिशें अपनी
एक ख्वाब़ में सिमट कर रह जाती है।

 ©मनीषा साहू 'पंछी'

Sunday, 5 June 2011

ये कैसी दुनियाँ..??


जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ।


एक झूठ पर टिकी है आज ज़िन्दगी सबकी,
नही है हिम्मत किसी में सच कहने की ।


करते है यहाँ सब फ़रेब की बातें,
और खुद को सच्चा कहने से भी नही डरते ।


कैसे करे यकीं यहाँ किसी और की बातों का,
जब खुद की परछाई भी यहाँ सच्ची नही लगती ।


कोई तो वजह होगी क्यों करते है भरोसा लोग औरों पर,
पर क्या करे ये दुनियाँ सब कुछ जो नही मिलता अपने भरोसे पर ।


हर तरफ बिखरा है शह और मात का खेल,
बन गयी है दुनियाँ हालात और लाचारी की एक रेल ।


खत्म हो रहा है जुनुन जिन्दगी में आगे निकलने का,
लक्ष्य है आज सबका एक दूसरे को पीछे ढकेलने का ।


जो चिराग़ करता था कल तक दुनियाँ को रोशन,
बुझा देता है आज उसे सिर्फ हवा का एक झोंका ।


जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ॥


                                            --मनीषा--

Tuesday, 31 May 2011


समेट लो तुम आज जितनी भी हैं खुशियाँ,
ताकि न रहे कोई गिल़ा तुम्हें ज़िन्दगी से।

एक बार नहीं बार बार मिले तुम्हें ऐसा पल,
ताकि रह न जाये कोई भी ख़ला इस रहगुज़र में।

ख़ुद को डुबा दो कुछ इस तरह खुशियोँ के सागर में,
कि तैर कर बाहर निकलना भी मुश्किल लगे।

कर दो खुश ईश्वर को भी अपने कर्मों से इतना कि,
जो चाहो उसे भी बदलना मुश्किल लगे।

साथ मिले तुम्हें ऐसे हमसफर का,
कि ख़ुदा से कुछ और माँगने की जरूरत न हो।

साथ दे हर कदम पर कुछ इस तरह वो,
कि किसी और को तुमसे कोई शिकायत न हो।

थाम लो इन पलों को अपनी मुट्ठी में कुछ इस तरह,
कि रेत बनकर इनका फिसलना भी मुश्किल लगे।

चढ़ते जाओ तुम उस शिखर पर ज़िन्दगी के,
जहाँ से वापस उतरना भी ज़रा मुश्किल लगे।।

                                          --मनीषा--

Wednesday, 25 May 2011

ये बारिश का मौसम..!!


रिमझिम रिमझिम बूँदें लाया,
ये बारिश का मौसम।
कितना अदभुत् कितना प्यारा,
बस यही कहे मेरा मन।

जब भी आती है बारिश,
मन खुशियों से भर जाता है।
पानी की कोमल बूँदों सा
मेरा दिल हो जाता है।

जब बरसे घनघोर घटायें,
सङके, गलियाँ सब भर जाये।
तब मैं और मेरे साथी मिलकर,
उस पर कागज की नाव चलाये।

सङको पर जाते भीगे लोग,
कुछ ठिठुरते तो कुछ मस्ती में।
पर मेरा मन तो लगा है केवल,
तैर रही उस कागज की कश्ती में।

सबके मन को है भाये,
ये गर्मी ठण्डी का संगम।
ठण्डक का एहसास कराता,
ये बारिश का मौसम।
कितना अदभुत् कितना प्यारा,
बस यही कहे मेरा मन।

                         --मनीषा--

स्वागत है उन बहारों का,
जो आयी है आज की सुबह।

स्वागत है उन खुशियों का,
जो रहेगीं साथ तुम्हारे सदा।

स्वागत है उस हिम्मत का,
जो रोज़ थोङी थोङी तुममे आती है।

स्वागत है उस धैर्य का,
जिससे दुनियाँ जीती जाती है।

स्वागत है उस रास्ते का,,
जो तुम्हें मंजिल तक ले जायेगा।

स्वागत है उस विश्वास का,
जो तुम्हें हर डर से बचायेगा।

स्वागत है हर उस वर्ष का,
जो तुम्हें समझदारी की दुनियाँ में ले जायेगा।

स्वागत है उन खुशियों भरे पल का,
जो तुम्हें हमारी याद दिलायेगा।

--मनीषा साहू 'पंछी'--

Thursday, 19 May 2011

हकीक़त में न सही,
पर सपनों में तो करीब़ आ जाया करो।
दिल में न सही,
आखों में तो समां जाया करो।

एक झलक दिखला के अपनी,
मेरी आँखों की प्यास बुझा जाओ।
न मिलो हकीक़त में तुम,
पर कभी तो ख्वाबों में आ जाओ।

तरस गयी हैं आँखें एक झलक को तुम्हारी,
तङपता है दिल तुम्हें महसूस करने को।
जाने कब से नही सुनी आवाज भी तुम्हारी,
हौसला भी नही रहा अब और सितम सहने को।

क्यूँ छोङ दिया मझधार में मुझे,
डूब जाने देते या साथ का वादा ही किया होता।
आ गयी है जिन्दगी मेरी एक ऐसे दोराहे पर,
शायद किसी एक राह पर मंजिल का निशां होता।

प्यार की रस्में हम निभाते चले गये,
और दर्द का आईना तुमने दिखा दिया।
उम्मीद तुम्हें पाने की एक, दिल मेँ रखकर,
खुद अपनी ही जिन्दगी को अपने हाथ जला दिया ।।

                                                   --मनीषा--

कौन हो तुम मेरे..??

हो कौन तुम मेरे,
क्यों मुझे याद आते हो।
क्या रिश्ता है मेरा तुमसे,
क्यों इस कद़र दिल को जलाते हो।

क्या कुछ एहसास जुङे है तुमसे,
या सिर्फ एक सपनों की डोर है।
या कोई चाहत है मेरी तुमसे,
या सिर्फ मेरे अरमानों की भोर है।

क्यूँ चले गये तुम दूर इतना,
पर करीब़ भी कब थे।
जान पाते तुमको तुम्हीं से,
ऐसे नसीब भी कब थे।

बहार आने से पहले,
ये कैसी रुत है आ गयी।
कि फूल खिलने से पहले ही,
ये कली मुरझा गयी। 

दोष किसका था यहाँ पर,
जान न पाये हम अब तक।
एक याद बाकी रहेगी दिल में,
साँस बाकी है ये जब तक।

ग़र कोई रिश्ता है मेरा तुमसे,
तो उस रिश्ते की खातिर वापस आ जाओ।
थाम लो मेरा हाथ कुछ पल के लिये,
चाहे फिर हाथ छोङ जाओ।

ग़र तुम हो राज़ी इस वज़ह पर,
तो समझो एक आरज़ू पूरी हो गयी।
न कोई अब गिला रहा किसी से,
मेरी ज़िन्दगी पूरी हो गयी। 

                  --मनीषा--
                                       

Friday, 29 April 2011

When I Cry...

When I cry,
I see you in my tears..
If that's the only way to see you,
Then I'll prefer to cry every day & night..

When somebody hurts me,
I see you in my heart..
If that's the only way to see you,
Then I'll do request to people to hurt me more..

When somebody cheat me,
I see you in my mind,
If that's the only way to see you,
Then I'll give the chance to the people to cheat me..

When i sleep,
I see you in my dream..
If that's the only way to see you,
Then I'll prefer to sleep forever..

When I feel very lonely,
I see you everywhere around me..
If that's the only way to see you,
Then I'll try to be lonely for whole life..

                   ---Manisha Sahu---

Saturday, 9 April 2011

ख़्वाब या हक़ीकत...



कभी ख़्वाब देखती हूँ कि मेरा ख़्वाब हक़ीकत बन गया है,
तो कभी हक़ीकत मेँ ख़्वाब देखती हूँ,
ख़्वाबों का क्या है,
ये तो आते जाते रहते हैँ,
हर दिन,
हर पल,
हर लम्हा,
पर उस हक़ीकत का क्या करुँ जो अब ख़्वाब बनने जा रही है,
कभी खुद पर हँसी आती है,
तो कभी हालात पर,
तो कभी दोनोँ पर,
खुद पर तो था भरोसा मुझे,
पर हालात ने धोखा दे दिया,
और अब हालात को सुधारने का वक्त ही कहाँ रहा,
खुद को तो मैँ समझा भी लूँ,
लेकिन इस दिल को कैसे समझाऊँ,
क्या समझाऊँ,
या एक सपना सम़झकर मैँ उन्हेँ हक़ीकत मेँ भूल जाऊँ,
सिर्फ सोचनेँ भर से ऐसा,
उनकी याद मेरे और कऱीब आ जाती है,
फिर आँसू बनकर यादेँ उनकी मेरी आँखों से छलक जाती हैँ,
इस क़दर उतर गये है वो दिल में मेरे,
कि अब मुमकिन नही है उनको भूल पाना,
क्या इतना आसान है,
उनके एहस़ासों को यूँ इस तरह मिटा पाना,
श़ायद नही,
इसीलिये उनके एहस़ासों को अब तक दिल में छुपाकर रखा है,
क़भी तो होगा उन्हें इसका एहस़ास,
बस थोङा सा यक़ीन बाकी है अभी भी मेरे दिल में,
बस डर है तो इस बात का,
कि क़ही ये यक़ीन भी  टूट जाये,
अग़र यही है अन्ज़ाम इस यक़ीन का,
तो  मेरे ख़ुदा,
बस इतना करम् करना मुझ पर,
कि यक़ीन टूटने से पहले,
मेरे साँसों की डोर टूट जाये।

                         --मनीषा--

Thursday, 31 March 2011

कभी कभी...


कभी कभी एक ख़्याल आता है दिल में,
कि कह दूँ उनसे अपने दिल की बात।
फिर सोंचती हूँ अभी रहने दूँ,
कुछ पता तो चले उनकी रज़ा क्या है।

रोज़ अपने दिल को समझाती हूँ,
कि मत कर याद उनको।
फिर सोचती हूँ उनको याद करने में,
मेरे दिल की खत़ा क्या है।

तकदीर ने हमें मिलाया उनसे,
पर तकदीर कब तक ये साथ निभायेगी।
थोङी कोशिश तो हम भी कर ले,
वरना इस खेल मेँ मज़ा क्या है।

शायद दिल में कोई और है उनके,
इसलिये हम पराये लगते है।
दिखला देगें एक दिन दिल जीत कर उनका,
वरना इस साँस की इल्तज़ा क्या है।

हमें ही चाहेंगें वो कुछ पल के बाद,
हमारे ही नाम का सजद़ा करेंगें।
सुहाना बनेगा सफर जिन्द़गी का,
वरना इस जिन्दगी में अब बचा क्या है।

वक्त लाया है इस मोङ पर हमें,
और वो बन गये है मंजिल हमारी।
चले है पाने मंजिल को हम अपनी,
न जाने इस सफर की इंतहा क्या है।

सितम करते है हर रोज़ वो हम पर,
सह लेते है क्योंकि हम उनसे ही प्यार करते है।
चाहते है हम, उनसे करे कुछ प्यार की बातें,
और पूछते है वो इन सबकी वज़ह क्या है।

कि है मोहब्बत, कोई गुनाह तो नहीं,
लुटा दी है दुनिया उनको पाने की चाह में।
आता नही मेरा नाम कभी उनकी ज़ुबान पर,
इससे बङकर इस दिल्लगी की सज़ा क्या है।

                           --मनीषा--

Sunday, 27 March 2011

When I think...


When I think about you,
Some tears are come out from my eyes..
I don't know, Why..??
Because I don't know that why do I think about you..
When I try to think that why do I think about you,
Instead of find the reason,
I am gone into the ocean of memories of yours..
It hurts me as much as it can..
When I think that you never think about me,
It hurts me again..
The day is gone to find out the reason that which hurts me more..
Whether I think about you, or
You never think about me..??
When the day goes, the night comes..
In night I decide not to think about you..
But which remains in the day,
That comes in night in my dream..
As night goes, the next day comes..
& my mind tries to think that what was I seen in my dream..
And again I think about you..
And some tears come out from my eyes again...!!

                                           By- Manisha Sahu