है कितना अजीब़ ये सफर ज़िन्दगी का,
न जाने कितनें अन्जानें मोङ हैं इसमें।
पहुँचता नहीं हर मोङ अपनी मंजिल तक,
सिमट जाती है कभी मंजिल ही खुद में।।
कभी ख़ुद को तन्हा अकेला है पाया,
कभी ख़ुद सफर हमसफर बन गया।
कभी रातें गुज़री थी यूँ ग़मज़दा,
कभी ख़ुद ये दर्द-ए-दवा बन गया।
कभी कोई साथी मिला था सफर में,
कभी वो भी हमसे खफ़ा हो गया।
किया था इन्तजार उसकी वफा का,
न जाने क्यूँ वो बेवफा हो गया।
हवायें अजब थीं, सदायें अजब थीं,
उस तन्हा सफर की फिज़ायें अजब थीं।
ऐसा छाया वो गुमनाम अन्धेरा,
कि सुबह का सूरज फना हो गया।
पहुँच गये करीब़ मंजिल के हम अपनी,
पर ज़िन्दगी का मकसद कहाँ खो गया।
चाहा लौटना उसी राह पर तो देखा,
ये सारा जहाँ गुमशुदा हो गया।
--मनीषा--
न जाने कितनें अन्जानें मोङ हैं इसमें।
पहुँचता नहीं हर मोङ अपनी मंजिल तक,
सिमट जाती है कभी मंजिल ही खुद में।।
कभी ख़ुद को तन्हा अकेला है पाया,
कभी ख़ुद सफर हमसफर बन गया।
कभी रातें गुज़री थी यूँ ग़मज़दा,
कभी ख़ुद ये दर्द-ए-दवा बन गया।
कभी कोई साथी मिला था सफर में,
कभी वो भी हमसे खफ़ा हो गया।
किया था इन्तजार उसकी वफा का,
न जाने क्यूँ वो बेवफा हो गया।
हवायें अजब थीं, सदायें अजब थीं,
उस तन्हा सफर की फिज़ायें अजब थीं।
ऐसा छाया वो गुमनाम अन्धेरा,
कि सुबह का सूरज फना हो गया।
पहुँच गये करीब़ मंजिल के हम अपनी,
पर ज़िन्दगी का मकसद कहाँ खो गया।
चाहा लौटना उसी राह पर तो देखा,
ये सारा जहाँ गुमशुदा हो गया।
--मनीषा--
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