फिर एक आह दिल से निकल गयी,
जहाँ से चले थे ज़िन्दगी वहीं ठहर गयी।
जिन निगाहों को संभाला था कि न देखे तुझे ,
जाने क्यूँ ये ग़ुनाह निगाहें फिर से कर गयीं॥
जहाँ से चले थे ज़िन्दगी वहीं ठहर गयी।
जिन निगाहों को संभाला था कि न देखे तुझे ,
जाने क्यूँ ये ग़ुनाह निगाहें फिर से कर गयीं॥
जाने कितने लम्हें बीत गए तुझे देखे हुये,
जो देखा तुझे ये धड़कन फिर से बढ़ गयी।
सबक़ न लिया कोई अपने टूटे हुए दिल से मैंने,
अब रोज़ टूट जाने की इसे आदत सी पढ़ गयी॥
अभी कुछ देर तक एक उम्म़ीद बाकी थी मुझमें,
वो उम्म़ीद भी अब दूर जाने कहाँ निकल गयी।
ख़ैर छोड़ो ये सब ज़िन्दगी के फ़लसफ़े हैं,
इन ठोकरों से ज़िन्दगी को एक असलियत मिल गयी॥
--मनीषा साहू 'पंछी'--