Friday, 30 November 2012

हर शख्स था नाराज मुझसे,
हर फिज़ा में थी उदासी।
हर ज़र्रे ने तोड़ा मुझे है,
अब जान बाकी है ज़रा सी॥


ज़िन्दगी ग़ुमनाम सी अब,
बन रही है एक पहेली।
कुछ ना जानू कब कहाँ,
जा रही हूँ मैं अकेली॥

 
वक़्त था जो साथ चलता,
हर गिरते-उठते कदम तक।
रूह तक
है काँप जाती,
एक कदम के वास्ते अब॥


--मनीषा साहू 'पंछी'--

Friday, 2 November 2012

कि मुझमे जान बाकी है....!!

अभी मंजिल की नहीं परवाह,
अभी तो शाम़ बाकी है।
वक़्त ठहर जा कुछ लम्हा,
तमाम़ काम बाकी है॥

अभी है ज़िन्दगी जीना,
हकीक़त जाननी है इसकी।
अभी जो पाने है मुझको,
वो सारे मुक़ाम बाकी है॥

अभी भी सीख रही हूँ मैं,
कि कैसे जीतना है जग को।
थोड़ा हौसला है खुद में,
थोड़ा गुमाऩ बाकी है॥

अभी है ख़्वाइशें धुंधली,
अभी सपने अधूरे हैं।
अभी कुछ अनकहे है जो,
मेरे अरमाऩ बाकी हैं॥

न कर कोशिश ज़माने में,
मुझे बदनाम करने की।
अभी भी इस जहाँ में कुछ,
मेरी पहचान बाकी है॥

मौत ठहर जा कुछ पल को,
न हो यूँ रूबरू मुझसे।
अभी ना जीत है तेरी,
कि मुझमे जान बाकी है॥


--मनीषा साहू 'पंछी'--