Tuesday, 31 May 2011


समेट लो तुम आज जितनी भी हैं खुशियाँ,
ताकि न रहे कोई गिल़ा तुम्हें ज़िन्दगी से।

एक बार नहीं बार बार मिले तुम्हें ऐसा पल,
ताकि रह न जाये कोई भी ख़ला इस रहगुज़र में।

ख़ुद को डुबा दो कुछ इस तरह खुशियोँ के सागर में,
कि तैर कर बाहर निकलना भी मुश्किल लगे।

कर दो खुश ईश्वर को भी अपने कर्मों से इतना कि,
जो चाहो उसे भी बदलना मुश्किल लगे।

साथ मिले तुम्हें ऐसे हमसफर का,
कि ख़ुदा से कुछ और माँगने की जरूरत न हो।

साथ दे हर कदम पर कुछ इस तरह वो,
कि किसी और को तुमसे कोई शिकायत न हो।

थाम लो इन पलों को अपनी मुट्ठी में कुछ इस तरह,
कि रेत बनकर इनका फिसलना भी मुश्किल लगे।

चढ़ते जाओ तुम उस शिखर पर ज़िन्दगी के,
जहाँ से वापस उतरना भी ज़रा मुश्किल लगे।।

                                          --मनीषा--

Wednesday, 25 May 2011

ये बारिश का मौसम..!!


रिमझिम रिमझिम बूँदें लाया,
ये बारिश का मौसम।
कितना अदभुत् कितना प्यारा,
बस यही कहे मेरा मन।

जब भी आती है बारिश,
मन खुशियों से भर जाता है।
पानी की कोमल बूँदों सा
मेरा दिल हो जाता है।

जब बरसे घनघोर घटायें,
सङके, गलियाँ सब भर जाये।
तब मैं और मेरे साथी मिलकर,
उस पर कागज की नाव चलाये।

सङको पर जाते भीगे लोग,
कुछ ठिठुरते तो कुछ मस्ती में।
पर मेरा मन तो लगा है केवल,
तैर रही उस कागज की कश्ती में।

सबके मन को है भाये,
ये गर्मी ठण्डी का संगम।
ठण्डक का एहसास कराता,
ये बारिश का मौसम।
कितना अदभुत् कितना प्यारा,
बस यही कहे मेरा मन।

                         --मनीषा--

स्वागत है उन बहारों का,
जो आयी है आज की सुबह।

स्वागत है उन खुशियों का,
जो रहेगीं साथ तुम्हारे सदा।

स्वागत है उस हिम्मत का,
जो रोज़ थोङी थोङी तुममे आती है।

स्वागत है उस धैर्य का,
जिससे दुनियाँ जीती जाती है।

स्वागत है उस रास्ते का,,
जो तुम्हें मंजिल तक ले जायेगा।

स्वागत है उस विश्वास का,
जो तुम्हें हर डर से बचायेगा।

स्वागत है हर उस वर्ष का,
जो तुम्हें समझदारी की दुनियाँ में ले जायेगा।

स्वागत है उन खुशियों भरे पल का,
जो तुम्हें हमारी याद दिलायेगा।

--मनीषा साहू 'पंछी'--

Thursday, 19 May 2011

हकीक़त में न सही,
पर सपनों में तो करीब़ आ जाया करो।
दिल में न सही,
आखों में तो समां जाया करो।

एक झलक दिखला के अपनी,
मेरी आँखों की प्यास बुझा जाओ।
न मिलो हकीक़त में तुम,
पर कभी तो ख्वाबों में आ जाओ।

तरस गयी हैं आँखें एक झलक को तुम्हारी,
तङपता है दिल तुम्हें महसूस करने को।
जाने कब से नही सुनी आवाज भी तुम्हारी,
हौसला भी नही रहा अब और सितम सहने को।

क्यूँ छोङ दिया मझधार में मुझे,
डूब जाने देते या साथ का वादा ही किया होता।
आ गयी है जिन्दगी मेरी एक ऐसे दोराहे पर,
शायद किसी एक राह पर मंजिल का निशां होता।

प्यार की रस्में हम निभाते चले गये,
और दर्द का आईना तुमने दिखा दिया।
उम्मीद तुम्हें पाने की एक, दिल मेँ रखकर,
खुद अपनी ही जिन्दगी को अपने हाथ जला दिया ।।

                                                   --मनीषा--

कौन हो तुम मेरे..??

हो कौन तुम मेरे,
क्यों मुझे याद आते हो।
क्या रिश्ता है मेरा तुमसे,
क्यों इस कद़र दिल को जलाते हो।

क्या कुछ एहसास जुङे है तुमसे,
या सिर्फ एक सपनों की डोर है।
या कोई चाहत है मेरी तुमसे,
या सिर्फ मेरे अरमानों की भोर है।

क्यूँ चले गये तुम दूर इतना,
पर करीब़ भी कब थे।
जान पाते तुमको तुम्हीं से,
ऐसे नसीब भी कब थे।

बहार आने से पहले,
ये कैसी रुत है आ गयी।
कि फूल खिलने से पहले ही,
ये कली मुरझा गयी। 

दोष किसका था यहाँ पर,
जान न पाये हम अब तक।
एक याद बाकी रहेगी दिल में,
साँस बाकी है ये जब तक।

ग़र कोई रिश्ता है मेरा तुमसे,
तो उस रिश्ते की खातिर वापस आ जाओ।
थाम लो मेरा हाथ कुछ पल के लिये,
चाहे फिर हाथ छोङ जाओ।

ग़र तुम हो राज़ी इस वज़ह पर,
तो समझो एक आरज़ू पूरी हो गयी।
न कोई अब गिला रहा किसी से,
मेरी ज़िन्दगी पूरी हो गयी। 

                  --मनीषा--