समेट लो तुम आज जितनी भी हैं खुशियाँ,
ताकि न रहे कोई गिल़ा तुम्हें ज़िन्दगी से।
एक बार नहीं बार बार मिले तुम्हें ऐसा पल,
ताकि रह न जाये कोई भी ख़ला इस रहगुज़र में।
ख़ुद को डुबा दो कुछ इस तरह खुशियोँ के सागर में,
कि तैर कर बाहर निकलना भी मुश्किल लगे।
कर दो खुश ईश्वर को भी अपने कर्मों से इतना कि,
जो चाहो उसे भी बदलना मुश्किल लगे।
साथ मिले तुम्हें ऐसे हमसफर का,
कि ख़ुदा से कुछ और माँगने की जरूरत न हो।
साथ दे हर कदम पर कुछ इस तरह वो,
कि किसी और को तुमसे कोई शिकायत न हो।
थाम लो इन पलों को अपनी मुट्ठी में कुछ इस तरह,
कि रेत बनकर इनका फिसलना भी मुश्किल लगे।
चढ़ते जाओ तुम उस शिखर पर ज़िन्दगी के,
जहाँ से वापस उतरना भी ज़रा मुश्किल लगे।।
एक बार नहीं बार बार मिले तुम्हें ऐसा पल,
ताकि रह न जाये कोई भी ख़ला इस रहगुज़र में।
ख़ुद को डुबा दो कुछ इस तरह खुशियोँ के सागर में,
कि तैर कर बाहर निकलना भी मुश्किल लगे।
कर दो खुश ईश्वर को भी अपने कर्मों से इतना कि,
जो चाहो उसे भी बदलना मुश्किल लगे।
साथ मिले तुम्हें ऐसे हमसफर का,
कि ख़ुदा से कुछ और माँगने की जरूरत न हो।
साथ दे हर कदम पर कुछ इस तरह वो,
कि किसी और को तुमसे कोई शिकायत न हो।
थाम लो इन पलों को अपनी मुट्ठी में कुछ इस तरह,
कि रेत बनकर इनका फिसलना भी मुश्किल लगे।
चढ़ते जाओ तुम उस शिखर पर ज़िन्दगी के,
जहाँ से वापस उतरना भी ज़रा मुश्किल लगे।।
--मनीषा--


