Thursday, 16 June 2011

ऐसा क्यूँ होता है..??

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा, जैसा चाहते है हम,
होता है उसके बिल्कुल विपरीत।
जब भूलना चाहते है पुरानी बातों को,
तो क्यूँ सामने आ जाता है अतीत।

संघर्ष करते है पूरी ज़िन्दगी हम,
फिर भी हासिल नहीं होती कोई जीत।
जिसे पा नहीं सकते इस जन्म में,
न जाने क्यूँ होती है उससे ही प्रीत।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....

क्यूँ गुज़ार देते हैं हम अपनी ज़िन्दगी,
एक झूठ पर भरोसा करके।
क्यूँ समझना नहीं चाहते हम,
ज़िन्दगी के इस कङवे सच को।

क्यूँ एक उम्मीद होती है अक़्सर,
कि शायद मंज़िल करीब है।
क्यूँ नहीं मानते हम इस सच को,
कि ये तो अपना अपना नसीब़ है।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....

क्यूँ नहीं कर पाते हम नफरत,
जिससे हम प्यार करते हैं।
क्यूँ भरी महफिल में भी खुद को,
तन्हा सा महसूस करते हैं।

क्यूँ छलक जाते हैं आँसू,
जब वो शक़्स दूर होता है।
क्यूँ होते हुये भी सब कुछ,
ये दिल मजबूर होता है।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....

क्यूँ खुशी के माहौल में भी,
एक याद चुपके से चली आती है।
क्यूँ लोगों की भीङ में भी हमें,
तन्हा सा कर जाती है।

क्यूँ बिना किसी मकसद के,
ये ज़िन्दगी चलती जाती है।
क्यूँ मन्ज़िल के करीब़ आकर,
अक्सर ये साँसेँ खत्म हो जाती हैं।

क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....कि सारी ख्वायिशें अपनी
एक ख्वाब़ में सिमट कर रह जाती है।

 ©मनीषा साहू 'पंछी'

Sunday, 5 June 2011

ये कैसी दुनियाँ..??


जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ।


एक झूठ पर टिकी है आज ज़िन्दगी सबकी,
नही है हिम्मत किसी में सच कहने की ।


करते है यहाँ सब फ़रेब की बातें,
और खुद को सच्चा कहने से भी नही डरते ।


कैसे करे यकीं यहाँ किसी और की बातों का,
जब खुद की परछाई भी यहाँ सच्ची नही लगती ।


कोई तो वजह होगी क्यों करते है भरोसा लोग औरों पर,
पर क्या करे ये दुनियाँ सब कुछ जो नही मिलता अपने भरोसे पर ।


हर तरफ बिखरा है शह और मात का खेल,
बन गयी है दुनियाँ हालात और लाचारी की एक रेल ।


खत्म हो रहा है जुनुन जिन्दगी में आगे निकलने का,
लक्ष्य है आज सबका एक दूसरे को पीछे ढकेलने का ।


जो चिराग़ करता था कल तक दुनियाँ को रोशन,
बुझा देता है आज उसे सिर्फ हवा का एक झोंका ।


जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ॥


                                            --मनीषा--