Tuesday, 12 November 2013

ये रात कहीं ना जायेगी....!!

जब थी ज़ुबा पर खामोशी,
और था दिल
में सुकून,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब ना था कुछ पाने का लालच,
ना था कुछ खोने का डर,
वो रात फ़िर ना आयेगी।


जब थी आँखो
में चैन की नींद,
खुद से करने को कोई प्रश्न न था,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब दूसरो की खुशी के लिये कर बैठे अपना नुकसान,
फ़िर भी दिल पर कोई बोझ न था,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब पराये भी लगने लगे अपने,
हम अपने कर्मो से पहचाने गये,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब खोकर सब कुछ एक उम्मीद न खोयी,
उसी के सहारे फ़िर नई शुरूवात हुयी,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब कलम से ये सब अल्फ़ाज़ लिखे,
उन अल्फ़ाज़ो का मतलब खोजने बैठै,
तब दिल से मेरे एक आवाज़ मिली,
जो सारी रात ये कहती रही,
कि जब तक तू ना चाहेगा, ये रात
कहीं ना जायेगी,
ये रात बस थम सी जायेगी, ये रात कहीं ना जायेगी...!!

            --मनीषा साहू 'पंछी'--

Thursday, 5 September 2013

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें...!!

सृष्टि का सन्चार शिव है,
गुरु है ज्ञान का आधार।
तप से मैं शिव को पा तो लूँ,
पर बिन गुरु कैसे हो ये साकार॥

पहला गुरु माँ को बतलाकर,
गुरु ने माँ को सम्मान दिया।
दूजा गुरु जिसने जग का भेद बताकर
सत्य असत्य का ज्ञान दिया॥

गुरु ही है जिसने ज्ञान पर अपने,
कभी नही अभिमान किया।
गुरु ही है जिसने तप से अपने,
दूर अज्ञान का अन्धकार किया॥


गुरु की महिमा है अपरमपार,
गुरु से ही जीवन्त है ये संसार।
जो गुरु ईश्वर का मार्ग दिखाये,
ऐसे गुरु को है मेरा नमस्कार॥


    --मनीषा साहू 'पंछी'--

Tuesday, 26 February 2013

फिर एक आह दिल से निकल गयी,
जहाँ से चले थे ज़िन्दगी वहीं ठहर गयी।
जिन निगाहों को संभाला था कि न देखे तुझे ,
जाने क्यूँ ये ग़ुनाह निगाहें फिर से कर गयीं
 
जाने कितने लम्हें बीत गए तुझे देखे हुये,
जो देखा तुझे ये धड़कन फिर से बढ़ गयी।
सबक़ न लिया कोई अपने टूटे हुए दिल से मैंने,
अब रोज़ टूट जाने की इसे आदत सी पढ़ गयी

अभी कुछ देर तक एक उम्म़ीद बाकी थी मुझमें,
वो उम्म़ीद भी अब दूर जाने कहाँ निकल गयी।
ख़ैर छोड़ो ये सब ज़िन्दगी के फ़लसफ़े हैं,
इन ठोकरों से ज़िन्दगी को एक असलियत मिल गयी

                     --मनीषा साहू 'पंछी'--

Thursday, 7 February 2013

Just I want to say....

I never force you to love me.
I never flirt with someone to make you angry.
I never warn you to do not speak with others.
I never say don’t do the thing you want.
You are like a bird for me.
Free to fly away anywhere you want to go.
Only thing you must to know.
Wherever you go or whatever you do.
When you decide to come back &
feel you need me.
Just remember..
I’m always here for you to give you Oceans of Love.


                             ---Unknown---

Tuesday, 1 January 2013

लो अंत हुआ लो बीत गया,
एक निर्मोही निर्दयी समय का।
ना मेरा था वो ना तेरा था,
वो था कुछ हाथों की कठपुतली।
अब तक था देखा समय नचाये,
अब खुद नाच रहा कुछ उंगली॥

रावण सा था बुद्धिमान वो,
फिर भी दस शीश कटा बैठा।
अब क्या गाऊं उन दिनों की गाथा,
जो खुद अपना वर्चस्व मिटा बैठा॥

जो बुद्धिमान की बुद्धि छीन कर,
बुद्धिहीन बना बैठा।
जो काले कुछ चेहरों के बाहर,
सफ़ेद नकाब लगा बैठा॥

समय व्याधि है या लोग व्याधि है,
इसका भेद ना जानूँ मैं।
कौन सही है कौन गलत है,
कैसे तुझको पहचानूँ मैं॥

साल के वो दिन 366,
कैसे बीते किससे पूछूँ।
हर दिल में है एक दर्द छुपा,
कैसे झेला किससे पूछूँ॥

साल की यह अंत रात है,
सब जग बिसराये बैठे है।
दिन बदलेगा युग बदलेगा,
ये आस लगाये बैठे है॥

काश नए एक दिन के साथ,
वक़्त भी कुछ बदल जाता।
बेबसी लाचारी जो अब है,
वो मंज़र कुछ तो थम जाता॥

लो आ पहुँचे एक नए वर्ष में,
शायद नया सवेरा लायेगा।
जो नैय्या डूबी है हम सब की,
उसको पार लगायेगा॥
 

--मनीषा साहू 'पंछी'--