Tuesday, 1 January 2013

लो अंत हुआ लो बीत गया,
एक निर्मोही निर्दयी समय का।
ना मेरा था वो ना तेरा था,
वो था कुछ हाथों की कठपुतली।
अब तक था देखा समय नचाये,
अब खुद नाच रहा कुछ उंगली॥

रावण सा था बुद्धिमान वो,
फिर भी दस शीश कटा बैठा।
अब क्या गाऊं उन दिनों की गाथा,
जो खुद अपना वर्चस्व मिटा बैठा॥

जो बुद्धिमान की बुद्धि छीन कर,
बुद्धिहीन बना बैठा।
जो काले कुछ चेहरों के बाहर,
सफ़ेद नकाब लगा बैठा॥

समय व्याधि है या लोग व्याधि है,
इसका भेद ना जानूँ मैं।
कौन सही है कौन गलत है,
कैसे तुझको पहचानूँ मैं॥

साल के वो दिन 366,
कैसे बीते किससे पूछूँ।
हर दिल में है एक दर्द छुपा,
कैसे झेला किससे पूछूँ॥

साल की यह अंत रात है,
सब जग बिसराये बैठे है।
दिन बदलेगा युग बदलेगा,
ये आस लगाये बैठे है॥

काश नए एक दिन के साथ,
वक़्त भी कुछ बदल जाता।
बेबसी लाचारी जो अब है,
वो मंज़र कुछ तो थम जाता॥

लो आ पहुँचे एक नए वर्ष में,
शायद नया सवेरा लायेगा।
जो नैय्या डूबी है हम सब की,
उसको पार लगायेगा॥
 

--मनीषा साहू 'पंछी'--

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