सुबह जो जागी तो कोई न था सामने,
सोंचा सपनों में ही होती तो तू पास तो होता।
खुद से ही बातें करनी पङती है अब मुझको,
ख़्वाबों में तुझे मेरी बातों का एहसास तो होता॥
तेरी चाहत का ख़ुमार छाया है मुझ पर,
हर तरफ बेकरारी सी लिपटी हुई है।
कितने बेदर्द लम्हें गुज़ारे तेरे बिन,
तुझे बयाँ करने को पास मेरे अल्फ़ाज तो होता॥
चंद लम्हों की थोङी सी खुशियों की खातिर,
तमाम खुशियों को कुऱबान हम कर गये।
खुद को भी भुला देती चाहत में तेरी,
तेरे दिल में मेरी मोहब्बत का आगाज़ तो होता॥
--मनीषा साहू 'पंछी'--
सोंचा सपनों में ही होती तो तू पास तो होता।
खुद से ही बातें करनी पङती है अब मुझको,
ख़्वाबों में तुझे मेरी बातों का एहसास तो होता॥
तेरी चाहत का ख़ुमार छाया है मुझ पर,
हर तरफ बेकरारी सी लिपटी हुई है।
कितने बेदर्द लम्हें गुज़ारे तेरे बिन,
तुझे बयाँ करने को पास मेरे अल्फ़ाज तो होता॥
चंद लम्हों की थोङी सी खुशियों की खातिर,
तमाम खुशियों को कुऱबान हम कर गये।
खुद को भी भुला देती चाहत में तेरी,
तेरे दिल में मेरी मोहब्बत का आगाज़ तो होता॥
--मनीषा साहू 'पंछी'--