Tuesday, 12 November 2013

ये रात कहीं ना जायेगी....!!

जब थी ज़ुबा पर खामोशी,
और था दिल
में सुकून,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब ना था कुछ पाने का लालच,
ना था कुछ खोने का डर,
वो रात फ़िर ना आयेगी।


जब थी आँखो
में चैन की नींद,
खुद से करने को कोई प्रश्न न था,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब दूसरो की खुशी के लिये कर बैठे अपना नुकसान,
फ़िर भी दिल पर कोई बोझ न था,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब पराये भी लगने लगे अपने,
हम अपने कर्मो से पहचाने गये,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब खोकर सब कुछ एक उम्मीद न खोयी,
उसी के सहारे फ़िर नई शुरूवात हुयी,
वो रात फ़िर ना आयेगी।

जब कलम से ये सब अल्फ़ाज़ लिखे,
उन अल्फ़ाज़ो का मतलब खोजने बैठै,
तब दिल से मेरे एक आवाज़ मिली,
जो सारी रात ये कहती रही,
कि जब तक तू ना चाहेगा, ये रात
कहीं ना जायेगी,
ये रात बस थम सी जायेगी, ये रात कहीं ना जायेगी...!!

            --मनीषा साहू 'पंछी'--

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