जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ।
एक झूठ पर टिकी है आज ज़िन्दगी सबकी,
नही है हिम्मत किसी में सच कहने की ।
करते है यहाँ सब फ़रेब की बातें,
और खुद को सच्चा कहने से भी नही डरते ।
कैसे करे यकीं यहाँ किसी और की बातों का,
जब खुद की परछाई भी यहाँ सच्ची नही लगती ।
कोई तो वजह होगी क्यों करते है भरोसा लोग औरों पर,
पर क्या करे ये दुनियाँ सब कुछ जो नही मिलता अपने भरोसे पर ।
हर तरफ बिखरा है शह और मात का खेल,
बन गयी है दुनियाँ हालात और लाचारी की एक रेल ।
खत्म हो रहा है जुनुन जिन्दगी में आगे निकलने का,
लक्ष्य है आज सबका एक दूसरे को पीछे ढकेलने का ।
जो चिराग़ करता था कल तक दुनियाँ को रोशन,
बुझा देता है आज उसे सिर्फ हवा का एक झोंका ।
जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ॥
--मनीषा--
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