Sunday, 5 June 2011

ये कैसी दुनियाँ..??


जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ।


एक झूठ पर टिकी है आज ज़िन्दगी सबकी,
नही है हिम्मत किसी में सच कहने की ।


करते है यहाँ सब फ़रेब की बातें,
और खुद को सच्चा कहने से भी नही डरते ।


कैसे करे यकीं यहाँ किसी और की बातों का,
जब खुद की परछाई भी यहाँ सच्ची नही लगती ।


कोई तो वजह होगी क्यों करते है भरोसा लोग औरों पर,
पर क्या करे ये दुनियाँ सब कुछ जो नही मिलता अपने भरोसे पर ।


हर तरफ बिखरा है शह और मात का खेल,
बन गयी है दुनियाँ हालात और लाचारी की एक रेल ।


खत्म हो रहा है जुनुन जिन्दगी में आगे निकलने का,
लक्ष्य है आज सबका एक दूसरे को पीछे ढकेलने का ।


जो चिराग़ करता था कल तक दुनियाँ को रोशन,
बुझा देता है आज उसे सिर्फ हवा का एक झोंका ।


जाने कैसी दुनियाँ है ये,
हर तरफ है बस फ़रेब और धोखा ॥


                                            --मनीषा--

No comments: