अभी मंजिल की नहीं परवाह,
अभी तो शाम़ बाकी है।
वक़्त ठहर जा कुछ लम्हा,
तमाम़ काम बाकी है॥
अभी है ज़िन्दगी जीना,
हकीक़त जाननी है इसकी।
अभी जो पाने है मुझको,
वो सारे मुक़ाम बाकी है॥
अभी भी सीख रही हूँ मैं,
कि कैसे जीतना है जग को।
थोड़ा हौसला है खुद में,
थोड़ा गुमाऩ बाकी है॥
अभी है ख़्वाइशें धुंधली,
अभी सपने अधूरे हैं।
अभी कुछ अनकहे है जो,
मेरे अरमाऩ बाकी हैं॥
न कर कोशिश ज़माने में,
मुझे बदनाम करने की।
अभी भी इस जहाँ में कुछ,
मेरी पहचान बाकी है॥
मौत ठहर जा कुछ पल को,
न हो यूँ रूबरू मुझसे।
अभी ना जीत है तेरी,
कि मुझमे जान बाकी है॥
--मनीषा साहू 'पंछी'--
अभी तो शाम़ बाकी है।
वक़्त ठहर जा कुछ लम्हा,
तमाम़ काम बाकी है॥
अभी है ज़िन्दगी जीना,
हकीक़त जाननी है इसकी।
अभी जो पाने है मुझको,
वो सारे मुक़ाम बाकी है॥
अभी भी सीख रही हूँ मैं,
कि कैसे जीतना है जग को।
थोड़ा हौसला है खुद में,
थोड़ा गुमाऩ बाकी है॥
अभी है ख़्वाइशें धुंधली,
अभी सपने अधूरे हैं।
अभी कुछ अनकहे है जो,
मेरे अरमाऩ बाकी हैं॥
न कर कोशिश ज़माने में,
मुझे बदनाम करने की।
अभी भी इस जहाँ में कुछ,
मेरी पहचान बाकी है॥
मौत ठहर जा कुछ पल को,
न हो यूँ रूबरू मुझसे।
अभी ना जीत है तेरी,
कि मुझमे जान बाकी है॥
--मनीषा साहू 'पंछी'--
2 comments:
बहुत सुन्दर
जी धन्यवाद...!!
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