Monday, 29 August 2011

कुछ इस तरह....

ग़म के सागर में खुद को डुबा लूँ कुछ इस तरह मैं,
खुशियों की बहारें भी आ जाये तो कुछ पता न चले।

हर ज़र्रे से मिटा दूँ तेरा नाम कुछ इस तरह मैं,
ग़र मुझे तेरी याद भी आये तो कुछ पता न चले।

बना लूँ दिल को अपने कठोर कुछ इस तरह मैं,
कोई फिर से चोंट कर जाये तो कुछ पता न चले।

ज़ुदा कर दूँ सपने को हक़ीकत से कुछ इस तरह मैं,
कोई सपना फिर से टूट जाये तो कुछ पता न चले।

अपनी नजरों से मिटा दूँ तेरा अक़्स कुछ इस तरह मैं,
तू सामने भी आ जाये तो कुछ पता न चले।

कर लूँ ज़ुदा ज़िन्दगी के बहानों से खुद को कुछ इस तरह मैं,
मेरा दिल ख़ामोश भी हो जाये तो कुछ पता न चले।

                                      --मनीषा--

No comments: