Saturday, 9 April 2011

ख़्वाब या हक़ीकत...



कभी ख़्वाब देखती हूँ कि मेरा ख़्वाब हक़ीकत बन गया है,
तो कभी हक़ीकत मेँ ख़्वाब देखती हूँ,
ख़्वाबों का क्या है,
ये तो आते जाते रहते हैँ,
हर दिन,
हर पल,
हर लम्हा,
पर उस हक़ीकत का क्या करुँ जो अब ख़्वाब बनने जा रही है,
कभी खुद पर हँसी आती है,
तो कभी हालात पर,
तो कभी दोनोँ पर,
खुद पर तो था भरोसा मुझे,
पर हालात ने धोखा दे दिया,
और अब हालात को सुधारने का वक्त ही कहाँ रहा,
खुद को तो मैँ समझा भी लूँ,
लेकिन इस दिल को कैसे समझाऊँ,
क्या समझाऊँ,
या एक सपना सम़झकर मैँ उन्हेँ हक़ीकत मेँ भूल जाऊँ,
सिर्फ सोचनेँ भर से ऐसा,
उनकी याद मेरे और कऱीब आ जाती है,
फिर आँसू बनकर यादेँ उनकी मेरी आँखों से छलक जाती हैँ,
इस क़दर उतर गये है वो दिल में मेरे,
कि अब मुमकिन नही है उनको भूल पाना,
क्या इतना आसान है,
उनके एहस़ासों को यूँ इस तरह मिटा पाना,
श़ायद नही,
इसीलिये उनके एहस़ासों को अब तक दिल में छुपाकर रखा है,
क़भी तो होगा उन्हें इसका एहस़ास,
बस थोङा सा यक़ीन बाकी है अभी भी मेरे दिल में,
बस डर है तो इस बात का,
कि क़ही ये यक़ीन भी  टूट जाये,
अग़र यही है अन्ज़ाम इस यक़ीन का,
तो  मेरे ख़ुदा,
बस इतना करम् करना मुझ पर,
कि यक़ीन टूटने से पहले,
मेरे साँसों की डोर टूट जाये।

                         --मनीषा--

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