Thursday, 31 March 2011

कभी कभी...


कभी कभी एक ख़्याल आता है दिल में,
कि कह दूँ उनसे अपने दिल की बात।
फिर सोंचती हूँ अभी रहने दूँ,
कुछ पता तो चले उनकी रज़ा क्या है।

रोज़ अपने दिल को समझाती हूँ,
कि मत कर याद उनको।
फिर सोचती हूँ उनको याद करने में,
मेरे दिल की खत़ा क्या है।

तकदीर ने हमें मिलाया उनसे,
पर तकदीर कब तक ये साथ निभायेगी।
थोङी कोशिश तो हम भी कर ले,
वरना इस खेल मेँ मज़ा क्या है।

शायद दिल में कोई और है उनके,
इसलिये हम पराये लगते है।
दिखला देगें एक दिन दिल जीत कर उनका,
वरना इस साँस की इल्तज़ा क्या है।

हमें ही चाहेंगें वो कुछ पल के बाद,
हमारे ही नाम का सजद़ा करेंगें।
सुहाना बनेगा सफर जिन्द़गी का,
वरना इस जिन्दगी में अब बचा क्या है।

वक्त लाया है इस मोङ पर हमें,
और वो बन गये है मंजिल हमारी।
चले है पाने मंजिल को हम अपनी,
न जाने इस सफर की इंतहा क्या है।

सितम करते है हर रोज़ वो हम पर,
सह लेते है क्योंकि हम उनसे ही प्यार करते है।
चाहते है हम, उनसे करे कुछ प्यार की बातें,
और पूछते है वो इन सबकी वज़ह क्या है।

कि है मोहब्बत, कोई गुनाह तो नहीं,
लुटा दी है दुनिया उनको पाने की चाह में।
आता नही मेरा नाम कभी उनकी ज़ुबान पर,
इससे बङकर इस दिल्लगी की सज़ा क्या है।

                           --मनीषा--

2 comments:

PRIYANKA YADAV said...

ab tk kha thi tum yar..........ye mere jyada suit karta hai

hellow said...

luv is all abt suffering dear..........b aware.........!!!!!