रेत़ जैसी है ज़िन्दगी हर पल फ़िसलती है कुछ लम्हा,
क़ाश इन लम्हों को समेटने का हुनर आता होता।
क़ाश इन लम्हों को समेटने का हुनर आता होता।
हर पल कुछ हसीन ख़्वाब देखती है ये ज़िन्दगी,
क़ाश उन ख़्वाबो को सच करने का हुनर आता होता।
सुकून की ज़िन्दगी की तलाश में खुद को थका बैठे इस कदर,
क़ाश लम्बे रस्ते को एक पल में तय करने का हुनर आता होता।
ख़ुद के सवालों में आज हम उलझे है कुछ इस कदर,
क़ाश इन सब सवालों से बच के निकलने का हुनर आता होता॥
--मनीषा--
No comments:
Post a Comment