Thursday, 5 January 2012

डायरी....

आज कई वर्षों बाद मैं अपने घर वापस लौटी। जब लौटी तो देखा, वही धूल से लिपटे हुये दरवाजे और खिड़कियाँ, फर्श पर बिछी हुयी धूल की चादर  और अलमारियोँ पर सजीं हुयी किताबें जो समय के साथ-साथ कुछ पीली सी पङ गई थी। तो दूसरी तरफ रखे थे कुछ रंग-बिरंगे पेन जो वक्त बीतने के साथ-साथ चलना भी भूल गये थे। और एक कोने में पङी थी वो पुरानी सी डायरी जो मेरे पूरे अतीत को आज भी खुद में समेटे हुये है।  जब मैनें डायरी खोली तो डायरी के पीले पङ चुके पन्नों ने मुझे एक बार फिर से अतीत में पहुँचा दिया।  अभी मैं अतीत की खुशनुम़ा यादों में खोई ही हुयी थी कि अचानक मेरी नज़र डायरी के उन पन्नों पर पङी जो कई साल पहले मैनें ही फाङ कर फेंक दिये थे।  क्योंकि ज़िन्दगी के कुछ ऐसे राज़ भी थे जिनकी असल ज़िन्दगी में कोई जगह न थी। ये वो राज़ थे जिसे सिर्फ मैं या मेरी  डायरी ही जानती थी

                                --मनीषा साहू 'पंछी'--

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