Tuesday, 23 June 2015

दिल

हर बार न जाने क्यूँ मुझको,
बस मुझको तोड़ा जाता है,
हर ग़म मुझको ही देते है,
तक़लीफ़ में छोड़ा जाता है।

क्या मेरा काम है बस प्यार करना,
तो घबराहट बतलाऊँ किसको,
तुम तो घर मेरा छोड़ चुके,
अब दर्द अपना सुनाऊँ किसको।

कुछ कहते है मैं कोमल हूँ,
कुछ कहते है पत्थर मुझको,
तुमने तो कहा था मैं हूँ नाज़ुक,
फिर पत्थर सा क्यूँ तोड़ा मुझको।

ये धड़कता था तेरी ख़ातिर,
सब सहता था तेरी ख़ातिर,
जब से तुमने ठुकराया इसको,
ये शायद धड़कना भूल गया।

©मनीषा साहू 'पंछी'

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