मुकद्दर हो न हो संग मेरे,
तुझे अपना बनाना है।
भले कितना खफ़ा हो तू,
तुझे फ़िर भी मनाना है॥
ये दिल न सोचता तुझको,
कभी ऐसा नहीं होता।
तू सपनो में ना आये,
कभी ऐसा नहीं होता॥
शिकायतें हो भले लाखों,
भले तू दूर हो मुझसे।
तेरे ही दिल के कोनें में,
घर अपना बनाना है॥
लम्हें तो बीत जाते है,
मगर ये दिन नहीं कटते।
खुशियाँ तो जा रहीं पल पल,
मगर ये ग़म नहीं घटते॥
किसी भी राह चल कर के,
अब तो मंज़िल को पाना है।
तेरे प्यार के सागर में,
अब खुद को डुबाना है॥
कि इतना हो करम मुझपे,
ये मुश्किलें दूर हो जाये।
कि तुझे पाने की चाहत में,
खु़दा को आज़माना है॥
तुझे अपना बनाना है।
भले कितना खफ़ा हो तू,
तुझे फ़िर भी मनाना है॥
ये दिल न सोचता तुझको,
कभी ऐसा नहीं होता।
तू सपनो में ना आये,
कभी ऐसा नहीं होता॥
शिकायतें हो भले लाखों,
भले तू दूर हो मुझसे।
तेरे ही दिल के कोनें में,
घर अपना बनाना है॥
लम्हें तो बीत जाते है,
मगर ये दिन नहीं कटते।
खुशियाँ तो जा रहीं पल पल,
मगर ये ग़म नहीं घटते॥
किसी भी राह चल कर के,
अब तो मंज़िल को पाना है।
तेरे प्यार के सागर में,
अब खुद को डुबाना है॥
कि इतना हो करम मुझपे,
ये मुश्किलें दूर हो जाये।
कि तुझे पाने की चाहत में,
खु़दा को आज़माना है॥
--मनीषा साहू 'पंछी'--
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