क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा, जैसा चाहते है हम,
होता है उसके बिल्कुल विपरीत।
जब भूलना चाहते है पुरानी बातों को,
तो क्यूँ सामने आ जाता है अतीत।
संघर्ष करते है पूरी ज़िन्दगी हम,
फिर भी हासिल नहीं होती कोई जीत।
जिसे पा नहीं सकते इस जन्म में,
न जाने क्यूँ होती है उससे ही प्रीत।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....
क्यूँ गुज़ार देते हैं हम अपनी ज़िन्दगी,
एक झूठ पर भरोसा करके।
क्यूँ समझना नहीं चाहते हम,
ज़िन्दगी के इस कङवे सच को।
क्यूँ एक उम्मीद होती है अक़्सर,
कि शायद मंज़िल करीब है।
क्यूँ नहीं मानते हम इस सच को,
कि ये तो अपना अपना नसीब़ है।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....
क्यूँ नहीं कर पाते हम नफरत,
जिससे हम प्यार करते हैं।
क्यूँ भरी महफिल में भी खुद को,
तन्हा सा महसूस करते हैं।
क्यूँ छलक जाते हैं आँसू,
जब वो शक़्स दूर होता है।
क्यूँ होते हुये भी सब कुछ,
ये दिल मजबूर होता है।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....
क्यूँ खुशी के माहौल में भी,
एक याद चुपके से चली आती है।
क्यूँ लोगों की भीङ में भी हमें,
तन्हा सा कर जाती है।
क्यूँ बिना किसी मकसद के,
ये ज़िन्दगी चलती जाती है।
क्यूँ मन्ज़िल के करीब़ आकर,
अक्सर ये साँसेँ खत्म हो जाती हैं।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....कि सारी ख्वायिशें अपनी
एक ख्वाब़ में सिमट कर रह जाती है।
©मनीषा साहू 'पंछी'
होता है उसके बिल्कुल विपरीत।
जब भूलना चाहते है पुरानी बातों को,
तो क्यूँ सामने आ जाता है अतीत।
संघर्ष करते है पूरी ज़िन्दगी हम,
फिर भी हासिल नहीं होती कोई जीत।
जिसे पा नहीं सकते इस जन्म में,
न जाने क्यूँ होती है उससे ही प्रीत।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....
क्यूँ गुज़ार देते हैं हम अपनी ज़िन्दगी,
एक झूठ पर भरोसा करके।
क्यूँ समझना नहीं चाहते हम,
ज़िन्दगी के इस कङवे सच को।
क्यूँ एक उम्मीद होती है अक़्सर,
कि शायद मंज़िल करीब है।
क्यूँ नहीं मानते हम इस सच को,
कि ये तो अपना अपना नसीब़ है।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....
क्यूँ नहीं कर पाते हम नफरत,
जिससे हम प्यार करते हैं।
क्यूँ भरी महफिल में भी खुद को,
तन्हा सा महसूस करते हैं।
क्यूँ छलक जाते हैं आँसू,
जब वो शक़्स दूर होता है।
क्यूँ होते हुये भी सब कुछ,
ये दिल मजबूर होता है।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....
क्यूँ खुशी के माहौल में भी,
एक याद चुपके से चली आती है।
क्यूँ लोगों की भीङ में भी हमें,
तन्हा सा कर जाती है।
क्यूँ बिना किसी मकसद के,
ये ज़िन्दगी चलती जाती है।
क्यूँ मन्ज़िल के करीब़ आकर,
अक्सर ये साँसेँ खत्म हो जाती हैं।
क्यूँ होता है अक़्सर ऐसा....कि सारी ख्वायिशें अपनी
एक ख्वाब़ में सिमट कर रह जाती है।
©मनीषा साहू 'पंछी'
3 comments:
hmmmm....mujhe nhi pata tha itna achcha likh dalti ho....badhiya hai jam k likho :) :) :)
lagta hai ap experience se likhti haa badi gehrai hai in bato me ye to vahi samajh sakta hai jisne ise jiya hai kya apne bhi kabhi pyar ke dard ko jiya hai
ख़्याल तो हरदम आते थे इस दिल में, बस उन्हें शब्दों में अब पिरोना आ गया है…!!!
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